देहरादून/नैनीताल : उत्तराखंड में अधिकारियों की संपत्तियों को लेकर समय-समय पर उठते सवालों के बीच एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। राज्य गठन के बाद से अब तक केवल एक आईएएस अधिकारी के खिलाफ ही आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला दर्ज किया गया है। हालांकि, दो अन्य अधिकारियों के खिलाफ सतर्कता विभाग की जांच अभी भी जारी है। यह खुलासा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी में हुआ है।
मुख्य वन संरक्षक हल्द्वानी एवं आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी द्वारा मांगी गई जानकारी के जवाब में कार्मिक एवं सतर्कता विभाग ने यह विवरण उपलब्ध कराया। जानकारी के अनुसार राज्य गठन के बाद अब तक भ्रष्टाचार, आय से अधिक संपत्ति और अन्य अनियमितताओं से जुड़े मामलों का रिकॉर्ड सूचना आयोग के निर्देश पर साझा किया गया।
रिटायर्ड IAS पर दर्ज हुआ मामला
सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट में बताया गया कि सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी राम विलास यादव के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला दर्ज किया गया था। सतर्कता अधिष्ठान देहरादून और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में सामने आया कि 31 दिसंबर 2016 से 1 जनवरी 2023 के बीच उनकी घोषित आय की तुलना में करोड़ों रुपये अधिक खर्च और संपत्ति पाई गई।
रिपोर्ट के मुताबिक संबंधित अवधि में उनकी कुल आय करीब 78 लाख रुपये थी, जबकि 21 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय सामने आया। इस आधार पर उनके खिलाफ भ्रष्टाचार और अवैध संपत्ति अर्जन के आरोपों में कार्रवाई की गई।
दो अधिकारियों की जांच अभी जारी
जानकारी में यह भी सामने आया कि आईएएस वरण चौधरी और आईएफएस किशन चंद के खिलाफ विभागीय एवं सतर्कता जांच जारी है। हरिद्वार में भूमि से जुड़ी अनियमितताओं और अन्य मामलों को लेकर इन अधिकारियों के खिलाफ जांच चल रही है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार कुछ मामलों में अभियोजन की स्वीकृति भी दी जा चुकी है, जबकि कुछ मामलों में रिपोर्ट का परीक्षण किया जा रहा है। पूर्व में आईएफएस अधिकारी अशोक मिश्रा के खिलाफ चली जांच को अदालत से दोषमुक्त होने के बाद बंद कर दिया गया था।
RTI से खुली व्यवस्था की परतें
यह मामला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि उत्तराखंड में लंबे समय से अधिकारियों की संपत्तियों और भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। बावजूद इसके, आधिकारिक रिकॉर्ड में बेहद सीमित कार्रवाई दर्ज होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
सूचना आयोग के हस्तक्षेप के बाद सामने आई इस जानकारी ने राज्य की प्रशासनिक पारदर्शिता और भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र की कार्यप्रणाली पर नई बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने भी मामले की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग उठानी शुरू कर दी









