रामनगर : उत्तराखंड के रामनगर वन प्रभाग के कोसी रेंज अंतर्गत टेड़ा गांव में शुक्रवार को एक दुर्लभ इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल (Petaurista philippensis) को एक ग्रामीण के घर से सुरक्षित रूप से रेस्क्यू किया गया। यह प्रजाति उत्तराखंड के जंगलों में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है, जिसकी अंतिम पुष्टि 12 वर्ष पूर्व 2014 में ढिकुली-गिरिजा क्षेत्र में हुई थी।

दुर्लभ प्रजाति का रेस्क्यू और पहचान
वन कर्मियों को सूचना मिलने के बाद कोसी रेंज के रेस्क्यू एक्सपर्ट आशीष कश्यप और राजेश कश्यप ने तुरंत कार्रवाई की। घर के अंदर घुसी इस बड़े आकार की गिलहरी को देखकर स्थानीय लोग हैरान रह गए। वन कर्मियों ने इसे सुरक्षित निकाला और जांच के बाद इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल की पुष्टि की।

रामनगर के पर्यावरणविद महेंद्र सिंह पवार ने बताया कि इसे कभी-कभी मलाबार भी कहा जाता है, क्योंकि यह पश्चिमी घाट के मलाबार क्षेत्र में भी पाई जाती है। यह मुख्य रूप से मध्य और उच्च हिमालयी क्षेत्र की प्रजाति है, लेकिन कार्बेट और शिवालिक तलहटी में इसका दिखना बेहद असामान्य और दुर्लभ है।
इंडियन जायंट फ्लाइंग स्क्विरल की विशेषताएं
यह रात्रिचर (नोक्टर्नल) प्राणी है, जो दिन में छिपकर रहता है और रात में सक्रिय होता है। इसके शरीर की लंबाई लगभग 30-45 सेमी और पूंछ 40-60 सेमी तक होती है। वजन 1.5 से 2 किलोग्राम तक हो सकता है।

इसकी सबसे अनोखी विशेषता पेटागियम (patagium) नामक त्वचा की झिल्ली है, जो इसके अग्र-पाद और पश्च-पाद के बीच फैली होती है। इसकी मदद से यह एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक 60 मीटर तक ग्लाइडिंग (तैरते हुए) कर सकता है। ध्यान दें, यह उड़ता नहीं है बल्कि नियंत्रित ढंग से ग्लाइड करता है।
आहार : फल, नट्स, कोमल पत्तियां, छाल और फूल। यह वन पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि बीज प्रसार (seed dispersal) में सहायक होता है।
संरक्षण स्थिति: वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की अनुसूची-II में शाउत्तराखंड में यह मुख्य रूप से रानीखेत, पौड़ी के लैंसडौन, पिथौरागढ़, चकराता और मसूरी के घने जंगलों में पाई जाती है। रामनगर क्षेत्र में इसका पुनः दर्शन जैव-विविधता संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाता है।मिल। IUCN रेड लिस्ट में Least Concern श्रेणी में है, लेकिन स्थानीय स्तर पर आवास हानि के कारण संरक्षण की जरूरत है।
उत्तराखंड में वितरण और महत्व
उत्तराखंड में यह मुख्य रूप से रानीखेत, पौड़ी के लैंसडौन, पिथौरागढ़, चकराता और मसूरी के घने जंगलों में पाई जाती है। रामनगर क्षेत्र में इसका पुनः दर्शन जैव-विविधता संरक्षण प्रयासों की सफलता को दर्शाता है।
उप प्रभागीय वनाधिकारी अंकित बडोला ने कहा, “यह दुर्लभ दर्शन हमारे जंगलों की समृद्धि और संरक्षण प्रयासों का प्रमाण है। इसे विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा और सुरक्षित जंगल क्षेत्र में छोड़ दिया जाएगा।”








