देहरादून : शनिवार को उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए एक बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने 60 वर्षों की लंबी राजनीतिक यात्रा के बाद 15 दिन तक राजनीतिक सोच और कार्यों से पूरी तरह व्रत रखने का फैसला लिया है। इसे उन्होंने “अर्जित अवकाश की पहली किश्त” बताया है। यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब उत्तराखंड में भाजपा के कई नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने की चर्चाएं जोरों पर हैं और 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।

रावत ने स्पष्ट लिखा कि यह ब्रेक कोई स्थायी संन्यास नहीं बल्कि आराम और चिंतन का समय है। उन्होंने कहा, “इन 60 वर्षों की अथक यात्रा के बाद मुझे एक सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में अर्जित अवकाश लेने का अधिकार प्राप्त हो गया है।”
60 वर्षों की संघर्षपूर्ण राजनीतिक यात्रा पर मनन
हरीश रावत उत्तराखंड की राजनीति के दिग्गज नेता हैं। उन्होंने युवावस्था से ही राजनीति में कदम रखा और कांग्रेस पार्टी के साथ लंबा सफर तय किया। पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में वे राज्य के विकास, किसान-मजदूर हित और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर हमेशा सक्रिय रहे। 60 साल की इस यात्रा में उन्होंने संघर्ष, सेवा और समर्पण की मिसाल पेश की।

शनिवार को बिजली और पानी की दरें बढ़ाने के सरकार के इरादे के खिलाफ उन्होंने एक घंटे का मौन व्रत रखा। इसके बाद मां दुर्गा के सभी नौ स्वरूपों की आराधना की। शांत मन से उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन के 60 वर्षों पर गहरा मनन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि अब थोड़ा ब्रेक लेने का समय आ गया है।
बिजली-पानी दर वृद्धि का विरोध और मां दुर्गा की आराधना
रावत का यह फैसला किसी अचानक उभरे भावुकता से नहीं बल्कि गहरी सोच-विचार का नतीजा है। उन्होंने बिजली और पानी की दरें बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए मौन व्रत रखा। इसके तुरंत बाद दुर्गा पूजा और चिंतन ने उन्हें नया रास्ता दिखाया। रावत ने लिखा कि अब वे 15 दिनों तक राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहेंगे।
इस दौरान वे राजनीतिक बैठकें, बयानबाजी या रणनीति पर कोई ध्यान नहीं देंगे। इसके बजाय वे मंदिरों में पूजा-अर्चना, ईद मिलन कार्यक्रमों और विभिन्न मांगलिक समारोहों में हिस्सा लेंगे। साथ ही अपनी जीवन यात्रा के उन महत्वपूर्ण प्रसंगों और मोड़ों को उकेरने की कोशिश करेंगे जो समय के साथ धुंधले पड़ चुके हैं।
15 दिनों का कार्यक्रम: पूजा, चिंतन और सामाजिक समारोह
रावत ने स्पष्ट किया कि यह 15 दिन का अवकाश राजनीतिक सोच से पूरी तरह अलगाव का समय होगा। वे लिखते हैं, “15 दिन तक राजनीतिक सोच व राजनीतिक कार्यों से व्रत रहूंगा।”
इस बीच:
मंदिरों में नियमित पूजा-अर्चना
कुछ ईद मिलन कार्यक्रम
मांगलिक समारोहों में भागीदारी
अपनी आत्मकथा जैसे प्रसंगों का लेखन/मनन
यह फैसला केवल व्यक्तिगत आराम नहीं बल्कि लंबे राजनीतिक सफर के बाद खुद को संभालने का मौका भी है।
राजनीतिक गलियारों में हलचल: नाराजगी या रणनीति?
रावत के इस ऐलान ने पूरे उत्तराखंड के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। कुछ लोग इसे कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी कलह या नाराजगी से जोड़ रहे हैं। खासकर तब जब भाजपा के रुद्रपुर से राजकुमार ठुकराल, सितारगंज से नारायण पाल, घनशाली से भीमलाल आर्य, भीमताल से लाखन नेगी और रुड़की से गौरव गोयल जैसे नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने की खबरें आ रही हैं।

सूत्रों के मुताबिक इन नेताओं के जॉइनिंग समारोह में हरीश रावत मौजूद नहीं रहेंगे। ऐसे में सवाल उठ रहा है – क्या यह नाराजगी है या कोई दूरगामी रणनीति? कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि यह फैसला 60 साल की सेवा के बाद लिया गया स्वाभाविक ब्रेक है, लेकिन विपक्ष इसे कांग्रेस की कमजोरी के रूप में देख रहा है।
उत्तराखंड राजनीति पर संभावित प्रभाव और 2027 चुनाव
उत्तराखंड में अगले वर्ष फरवरी-मार्च में विधानसभा चुनाव होने हैं। हरीश रावत जैसी दिग्गज शख्सियत का 15 दिन का ब्रेक पार्टी की रणनीति पर असर डाल सकता है। रावत कांग्रेस के प्रमुख चेहरे रहे हैं और उनकी अनुपस्थिति में नए चेहरों को मौका मिल सकता है।
दूसरी ओर, यह ब्रेक रावत को नई ऊर्जा भी दे सकता है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि लंबे समय तक सक्रिय रहने के बाद थोड़ा विश्राम नेता को तरोताजा बनाता है।











