कानपुर : कानपुर शहर में निजी अस्पतालों के जरिए चल रहे अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का पुलिस ने बड़ा पर्दाफाश कर दिया है। इस अंतरराज्यीय गिरोह ने न सिर्फ कानपुर बल्कि देहरादून, मेरठ, दिल्ली, लखनऊ और बिहार तक अपना जाल फैला रखा था। पुलिस जांच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा देहरादून के एक युवा MBA छात्र आयुष का है, जो आर्थिक तंगी के चलते इस रैकेट का शिकार बन गया।
आयुष, मूल रूप से बिहार का रहने वाला और वर्तमान में देहरादून के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में MBA अंतिम वर्ष का छात्र है, को बिचौलिए ने लाखों रुपये का लालच देकर फंसाया। शुरुआती सौदा मात्र चार लाख रुपये का था, लेकिन बाद में पूरा भुगतान न होने पर विवाद हुआ और पूरा रैकेट सामने आ गया। पुलिस ने अब तक इस मामले में अस्पताल संचालकों, डॉक्टरों और बिचौलियों समेत छह लोगों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि कई अन्य फरार हैं।
यह मामला न केवल अवैध ट्रांसप्लांट तक सीमित है बल्कि मानव अंग तस्करी और संभावित किडनी चोरी की आशंकाओं को भी जन्म दे रहा है। स्वास्थ्य विभाग और कानपुर पुलिस की संयुक्त टीम ने कई अस्पतालों में छापेमारी की, जिसमें गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं।
देहरादून लिंक: MBA छात्र आयुष को कैसे फंसाया गया?
जांच एजेंसियों का कहना है कि देहरादून का यह छात्र आर्थिक दबाव और पढ़ाई की फीस जुटाने की मजबूरी में रैकेट के संपर्क में आया। बिचौलिया शिवम अग्रवाल (उर्फ शिवम काड़ा) ने आयुष से संपर्क किया और किडनी डोनेट करने के बदले भारी भरकम रकम का लालच दिया।
आयुष ने बताया कि उसे कानपुर बुलाकर पहले मेडलाइफ अस्पताल, अंबेडकरपुरम में भर्ती कराया गया। बाद में ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया केशवपुरम स्थित आहूजा मेडिकल सेंटर में कराई गई। डोनर के रूप में आयुष की किडनी मेरठ निवासी एक महिला मरीज को लगाई गई। सौदा शुरू में चार लाख का था, लेकिन पुलिस सूत्रों के मुताबिक डोनर को सिर्फ 9-10 लाख रुपये ही दिए गए, जबकि रिसीवर पक्ष से 60 लाख से 90 लाख रुपये तक वसूले गए।
पुलिस को आशंका है कि यह गिरोह आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं और विभिन्न राज्यों के छात्रों को निशाना बना रहा था। देहरादून एंगल जांच का केंद्र बन गया है क्योंकि यहां से अन्य युवाओं को भी लुभाने की कोशिशें हो सकती हैं। मोबाइल चैट्स, बैंक ट्रांजेक्शन और टेलीग्राम मैसेजेस की जांच से और कड़ियां सामने आने की उम्मीद है।
आहूजा अस्पताल में हुआ कथित अवैध ट्रांसप्लांट, अनुमति के बिना सर्जरी
जांच में सामने आया है कि कानपुर में केवल एक निजी अस्पताल को आधिकारिक तौर पर किडनी ट्रांसप्लांट की अनुमति है। इसके बावजूद आहूजा मेडिकल सेंटर समेत अन्य अस्पतालों में बिना जरूरी दस्तावेजों और स्वीकृति के ट्रांसप्लांट किए जा रहे थे।
मेरठ की महिला रिसीवर को पहले मेडलाइफ अस्पताल में भर्ती कराया गया, फिर आहूजा अस्पताल में ऑपरेशन किया गया। डॉक्टरों की टीम दिल्ली और लखनऊ से बुलाई जाती थी। पुलिस का मानना है कि यह रैकेट लंबे समय से सक्रिय था और कई अन्य अस्पताल भी इसमें शामिल हो सकते हैं। कुल 11 अस्पतालों के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।
कौन-कौन गिरफ्तार, कौन फरार? पुलिस की बड़ी कार्रवाई
पुलिस ने अब तक निम्नलिखित लोगों को गिरफ्तार किया है:
डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा – आहूजा अस्पताल के संचालक
डॉ. प्रीति आहूजा – सह-संचालक और डॉक्टर
डॉ. राजेश कुमार
राम प्रकाश
डॉ. नरेंद्र सिंह
शिवम अग्रवाल – मुख्य बिचौलिया और एंबुलेंस चालक
फरार आरोपी:
डॉ. रोहित उर्फ राहुल (लखनऊ लिंक)
डॉ. अफजल (मेरठ लिंक)
वैभव
डॉ. अनुराग उर्फ अमित
इन सभी पर मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम (THOA) की विभिन्न धाराओं के साथ ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं में केस दर्ज किया गया है। दोष साबित होने पर 10 साल तक की सजा और 5 से 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लग सकता है।
रैकेट कैसे चलता था? लाखों का मुनाफा, गरीब युवा शिकार
पुलिस जांच के अनुसार, डोनर से 8-10 लाख रुपये में सौदा किया जाता था, जबकि रिसीवर से 60 लाख से 90 लाख रुपये तक वसूले जाते थे। बिचौलिए युवाओं को आर्थिक लालच देकर फंसाते थे। ट्रांसप्लांट के लिए बाहर से डॉक्टर बुलाए जाते थे।
यह रैकेट देहरादून, मेरठ, दिल्ली, लखनऊ और बिहार तक फैला हुआ था। कई मामलों में किडनी स्टोन या गॉलब्लेडर ऑपरेशन के नाम पर ट्रांसप्लांट का खेल चलाया जा रहा था। पुलिस अब बैंक अकाउंट्स, कॉल डिटेल्स और चैट्स की गहन जांच कर रही है ताकि पूरे नेटवर्क को समाप्त किया जा सके।
पुलिस की आगे की रणनीति और चेतावनी
कानपुर पुलिस का कहना है कि यह मामला केवल एक ट्रांसप्लांट तक सीमित नहीं है। इसमें अंग तस्करी का बड़ा सिंडिकेट हो सकता है। जांच एजेंसियां अन्य राज्यों के साथ समन्वय कर रही हैं। देहरादून पुलिस भी छात्र आयुष से जुड़े पहलुओं की जांच में जुट गई है।
सामान्य जनता को सलाह दी गई है कि किसी भी तरह के अंग दान या ट्रांसप्लांट से पहले सरकारी प्रक्रिया और अनुमति सुनिश्चित करें। आर्थिक लालच में फंसकर अवैध गतिविधियों में शामिल न हों, क्योंकि इसमें न सिर्फ स्वास्थ्य बल्कि कानूनी परेशानियां भी हो सकती हैं।
यह खुलासा स्वास्थ्य क्षेत्र में व्याप्त अनियमितताओं को उजागर करता है। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की सतर्कता से ऐसे रैकेटों पर लगाम लगाने की उम्मीद जताई जा रही है। आगे की जांच से और बड़े खुलासे हो सकते हैं।












