शासनादेश से खनन माफियाओं को मिला फायदा
मोर्चा ने बताया कि मुख्यमंत्री धामी ने 4 जुलाई 2021 को शपथ लेने के दो महीने बाद उनके करीबी अधिकारी मीनाक्षी सुंदरम ने एक शासनादेश जारी किया। इसमें कोविड-19 महामारी और “Ease of Doing Business” का हवाला देकर स्टोन क्रेशर और स्क्रीनिंग प्लांट्स के नवीनीकरण की प्रक्रिया को बेहद आसान कर दिया गया।
अब सिर्फ स्वप्रमाणित शपथपत्र के आधार पर ही नवीनीकरण मिलने लगा। जबकि पहले इस प्रक्रिया में पर्यावरण विभाग, वन विभाग, राजस्व विभाग की अनुमति जरूरी थी और साथ ही स्थल निरीक्षण, ड्रोन फुटेज और वीडियोग्राफी की पारदर्शी व्यवस्था भी थी।
17 दिनों में 150 से अधिक नवीनीकरण
आरटीआई दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि धामी सरकार के शासनादेश के बाद केवल 17 दिनों में 150 से अधिक स्टोन क्रेशर और स्क्रीनिंग प्लांट्स का नवीनीकरण कर दिया गया। इस प्रक्रिया में मुख्यमंत्री के करीबी अधिकारियों – राजपाल लेघा और एल.एस. पैट्रिक – को नोडल और अधिकृत अधिकारी बनाया गया।
आवेदनों में फर्जीवाड़ा और नियमों की अनदेखी
दस्तावेज बताते हैं कि जिन आवेदनों पर नवीनीकरण हुआ, उनमें कई जगह एक जैसी हैंडराइटिंग मिली। कई प्लांट्स की पर्यावरणीय अनुमति खत्म हो चुकी थी या थी ही नहीं। वन विभाग द्वारा आरक्षित वन भूमि मानकर अनुमति देने से इनकार करने के बावजूद भी वहां नवीनीकरण कर दिया गया।
राजस्व विभाग से कोई अनुमति नहीं ली गई और न ही खसरा-खतौनी में स्वामित्व की पुष्टि हुई। कई आवेदन एक ही दिन भरे गए, जांच भी उसी दिन पूरी हुई और उसी दिन नवीनीकरण की संस्तुति भी कर दी गई।
चुनावी फंड के लिए वसूले गए करोड़ों रुपये
मोर्चा ने दावा किया कि इस पूरे खेल में हर स्टोन क्रेशर और स्क्रीनिंग प्लांट से 2 से 3 करोड़ रुपये वसूले गए। सिर्फ 17 दिनों में लगभग 300 से 400 करोड़ रुपये चुनावी फंड के लिए इकट्ठा किए गए।
धामी सरकार पर गंभीर आरोप
प्रेस कांफ्रेंस में कहा गया कि यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि पूरे उत्तराखंड की आत्मा पर किया गया डाका है। नदियों को लूटा गया, जंगलों को उजाड़ा गया और पहाड़ों को बेचा गया। आरोप लगाया गया कि धामी सरकार जनता की नहीं बल्कि खनन माफियाओं की सरकार है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पहचान अब केवल “खनन प्रेमी मुख्यमंत्री” के तौर पर ही रह गई है।