टिहरी : सुरकंडा देवी रोपवे का संचालन 30 मार्च से 5 अप्रैल 2026 तक पूरी तरह बंद रहेगा। यह जानकारी रोपवे समन्वयक नरेश बिजल्वाण ने दी है। इस दौरान रोपवे में जरूरी मरम्मत और रखरखाव का कार्य किया जाएगा। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित सिद्धपीठ सुरकंडा देवी मंदिर पहुंचने वाले हजारों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को कद्दूखाल से मंदिर तक लगभग डेढ़ किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पैदल तय करनी पड़ेगी।

यह बंदी सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखकर की गई है। रोपवे 2022 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा लोकार्पित हुआ था और तब से यह श्रद्धालुओं के लिए बड़ी राहत साबित हो रहा है।
सुरकंडा देवी रोपवे बंद रहने का कारण और अवधि
रोपवे समन्वयक नरेश बिजल्वाण के अनुसार, 30 मार्च 2026 से 5 अप्रैल 2026 तक कुल 7 दिन रोपवे का संचालन बंद रहेगा। इस अवधि में केबल, ट्रॉली और अन्य यांत्रिक हिस्सों की नियमित मरम्मत की जाएगी। पहाड़ी क्षेत्र में रोपवे को साल भर चलाने के लिए समय-समय पर रखरखाव जरूरी होता है, खासकर बर्फबारी, बारिश और भूस्खलन के मौसम के बाद।
मरम्मत कार्य समय पर पूरा करने से भविष्य में किसी भी प्रकार की खराबी या दुर्घटना का खतरा कम होगा। श्रद्धालुओं की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। रोपवे की लंबाई करीब 502 मीटर है और यह कद्दूखाल से मंदिर परिसर तक मात्र 5-10 मिनट में पहुंचा देता है। बंदी के दौरान यह सुविधा उपलब्ध नहीं रहेगी।
कद्दूखाल से सुरकंडा देवी मंदिर तक पैदल यात्रा: क्या है रूट प्लान
रोपवे बंद रहने पर श्रद्धालुओं को कद्दूखाल गांव से सुरकंडा देवी मंदिर तक लगभग 1.5 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी होगी। यह रास्ता पुराना ट्रेक रूट है, जो पहले रोपवे शुरू होने से पहले इस्तेमाल होता था। चढ़ाई खड़ी है और इसमें करीब 1 से 1.5 घंटे का समय लग सकता है।
रास्ते में बीच-बीच में विश्राम स्थल और पानी की व्यवस्था है, लेकिन बुजुर्गों, दिव्यांगों और छोटे बच्चों वाले परिवारों को थोड़ी दिक्कत हो सकती है। कद्दूखाल चंबा-मसूरी रोड पर स्थित है, जहां से अच्छी सड़क पहुंच है। देहरादून, ऋषिकेश या मसूरी से बस या टैक्सी द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। पैदल यात्रा के दौरान आरामदायक जूते, पानी की बोतल, छाता या रेनकोट और हल्का स्नैक साथ रखें।
सुरकंडा देवी मंदिर का धार्मिक महत्व और आकर्षण
सुरकंडा देवी मंदिर 2750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक प्राचीन सिद्धपीठ है। मां दुर्गा के विभिन्न रूपों में पूजी जाने वाली देवी यहां श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। गढ़वाल हिमालय की गोद में बसा यह मंदिर हिमालय की बर्फीली चोटियों का मनमोहक नजारा प्रस्तुत करता है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यहां का दृश्य अविस्मरणीय होता है।

हर साल नवरात्रों में हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। रोपवे शुरू होने के बाद पर्यटकों की संख्या भी बढ़ी है। मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना, प्रसाद वितरण और आरती की व्यवस्था अच्छी है। रोपवे बंदी के बावजूद मंदिर के कपाट खुले रहेंगे और दर्शन सामान्य रूप से होते रहेंगे।
रोपवे बंदी के दौरान यात्रा की तैयारी और जरूरी सुझाव
समय प्रबंधन: सुबह जल्दी निकलें ताकि दोपहर तक दर्शन हो सकें।
मौसम चेक: मार्च-अप्रैल में दिन गर्म और शाम ठंडी होती है। मौसम ऐप या लोकल जानकारी लें।
स्वास्थ्य सावधानी: हाई एल्टीट्यूड है, इसलिए धीरे-धीरे चढ़ें। सांस की समस्या वाले लोग डॉक्टर से सलाह लें।
पार्किंग और बस: कद्दूखाल में पर्याप्त पार्किंग है। देहरादून से सीधी बसें भी उपलब्ध हैं।
ऑनलाइन जानकारी: मंदिर प्रशासन या रोपवे अथॉरिटी के नोटिस नियमित चेक करें।
ये छोटे-छोटे सुझाव यात्रा को सुगम और यादगार बना देंगे।
रोपवे की उपयोगिता और भविष्य की योजनाएं
2022 में शुरू हुए इस रोपवे ने सुरकंडा देवी यात्रा को क्रांतिकारी बदलाव दिया। पहले 1.5 किमी की चढ़ाई में 1-2 घंटे लगते थे, अब 5-10 मिनट। क्षमता 500 व्यक्ति प्रति घंटा होने से भीड़ भी आसानी से संभाली जा सकती है। मरम्मत के बाद रोपवे और बेहतर सुविधा के साथ चलेगा। उत्तराखंड सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ऐसे प्रोजेक्ट लगातार शुरू कर रही है।
श्रद्धालुओं के लिए संदेश और निष्कर्ष
सुरकंडा देवी रोपवे की 7 दिन की बंदी एक छोटा सा असुविधा का समय है, लेकिन मां सुरकंडा के दर्शन की चाहत में यह रुकावट नहीं आनी चाहिए। पैदल चढ़ाई में भी श्रद्धा और उत्साह बनाए रखें। मरम्मत कार्य पूरा होने के बाद रोपवे फिर से सुचारू रूप से चालू हो जाएगा।
जो भी श्रद्धालु इस दौरान यात्रा पर निकल रहे हैं, वे सुरक्षित रहें, पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखें और मंदिर में शांति बनाए रखें। सुरकंडा देवी माता सभी की मनोकामनाएं पूरी करें।











