रुद्रप्रयाग : उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। नगरासू क्षेत्र में आधी रात को अस्पताल ले जाई जा रही गर्भवती की एम्बुलेंस बीच रास्ते में ही जवाब दे गई। मजबूरन महिला को उसी बंद पड़ी गाड़ी में बच्चे को जन्म देना पड़ा। गनीमत रही कि जच्चा-बच्चा फिलहाल सुरक्षित हैं, लेकिन सिस्टम कब सुरक्षित होगा—यह बड़ा सवाल है।
सूत्रों के अनुसार, भटगाँव की एक गर्भवती महिला को देर रात प्रसव पीड़ा हुई। परिजनों ने एम्बुलेंस बुलाई और उसे अस्पताल ले जाया जाने लगा। लेकिन शिवनंदी पहुँचते-पहुँचते एम्बुलेंस खराब हो गई।
महिला दर्द से कराहती रही, पर व्यवस्था मौन रही। दूसरी एम्बुलेंस आने में करीब एक घंटा लग गया। इस बीच परिजनों और स्थानीय लोगों ने मिलकर एम्बुलेंस में ही प्रसव करवाया।
ग्रामीणों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब एम्बुलेंस ने बीच रास्ते दम तोड़ा हो। जिले में कुल 12 एम्बुलेंस हैं, जिनमें से केवल 8 चलने लायक हैं—बाकी अपनी-अपनी कार्यशाला में आराम कर रही हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने मामले को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताकर 20 नई एम्बुलेंस की मांग भेजने की बात कहकर अपनी जिम्मेदारी की रस्म निभा दी।
ग्रामीणों का कहना है कि
“जच्चा-बच्चा तो सुरक्षित हैं, पर इस व्यवस्था का इलाज कौन करेगा?”
ऐसी घटनाएँ दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक तस्वीर दिखाती हैं। आश्वासन तो साल-दर-साल आते हैं, पर जमीनी हालात आज भी वही—जर्जर एम्बुलेंस और मरीजों की किस्मत पर निर्भर स्वास्थ्य।









