देहरादून : दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे (Delhi-Dehradun Expressway) के महत्वपूर्ण 12 किलोमीटर लंबे गणेशपुर से डाटकाली वाले एलिवेटेड सेक्शन में भू-संरचना संबंधी गंभीर समस्याएं उभरकर सामने आई हैं। शिवालिक की रेतीली और कमजोर पहाड़ियां बार-बार दरक रही हैं, जिससे यात्रियों की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने यात्री सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए एलिवेटेड रोड की दिल्ली दिशा वाली बायीं लेन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है और ढलान स्थिरीकरण (Slope Stabilization) का कार्य तेजी से कर रहा है।
समस्या की जड़: शिवालिक की अस्थिर पहाड़ियां
एलिवेटेड रोड के विभिन्न हिस्सों में शिवालिक पर्वतमाला की रेतीली मिट्टी वाली पहाड़ियां अपनी जगह पर टिक नहीं पा रही हैं। बारिश और धूप दोनों ही स्थितियों में ये पहाड़ियां दरक रही हैं और मलबा गिर रहा है। विशेष रूप से डाटकाली मंदिर क्षेत्र में ओवरपास के पास यह समस्या सबसे गंभीर है, जहां छोटे-बड़े बोल्डर और रेतीला मलबा लगातार गिर रहा है।
यह स्थिति एक्सप्रेसवे के निर्माण के दौरान भी चिंता का विषय रही थी, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इसे और गंभीर बना दिया है। NHAI ने सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए 23 मई को लगभग 600 मीटर हिस्से पर एक लेन बंद कर दी थी। शुरू में 8 जून तक कार्य पूरा कर यातायात बहाल करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन जटिल भू-संरचना के कारण कार्य में देरी हो रही है।
NHAI की प्रतिक्रिया और वर्तमान यातायात व्यवस्था
NHAI ने ढलान स्थिरीकरण के लिए व्यापक प्रयास शुरू किए हैं। इसमें पहाड़ी के खड़े ढलान को लगभग 30 डिग्री तक स्लोप करके स्लोप क्लेडिंग (Slope Cladding) करने और वनस्पति रोपण के माध्यम से मिट्टी को मजबूत करने की योजना शामिल है। हालांकि, कार्य अभी भी पूरा नहीं हो सका है।
वर्तमान ट्रैफिक डायवर्शन:
दिल्ली की ओर से आने वाले वाहनों को दायीं लेन पर शिफ्ट किया गया है।
देहरादून से दिल्ली जाने वाले वाहनों को मोहंड के पुराने मार्ग से गुजारा जा रहा है।
डाटकाली मंदिर क्षेत्र में यूटर्न बंद होने के कारण यात्रियों को अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है।
डाटकाली मंदिर पर पड़ रहा प्रभाव
डाटकाली मंदिर (Datkali Temple) हजारों श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र है। मंदिर दर्शन के बाद देहरादून लौटने वाले यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें सुरंग से वापस लौटना पड़ रहा है और फिर पुराने मार्ग से यूटर्न लेकर एलिवेटेड रोड की दायीं लेन पकड़नी पड़ रही है। NHAI इस क्षेत्र में यातायात को सुगम बनाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं मजबूत कर रहा है।
विशेषज्ञों की राय
प्रो. एमपीएस बिष्ट, वरिष्ठ भूविज्ञानी और एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष, ने कहा कि शिवालिक की पहाड़ियां रेतीली मिट्टी से बनी हैं और इनकी मिट्टी धारण क्षमता बेहद कम है। वर्तमान में ये वनस्पतिविहीन हैं, जिससे वर्षा और धूप दोनों में दरारें पड़ रही हैं। स्थायी समाधान के लिए ढलान को 30 डिग्री तक लाकर स्लोप क्लेडिंग और वनस्पति रोपण आवश्यक है, अन्यथा खतरा बरकरार रहेगा।









