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सिस्टम से भिड़ने वाले अफसर की कहानी – इनाम भी, सज़ा भी!

सिस्टम से भिड़ने वाले अफसर की कहानी – इनाम भी, सज़ा भी!
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भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाकर न केवल प्रशासनिक प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का प्रयास किया है, बल्कि पुरस्कार और प्राप्त धनराशि को समाज सेवा में समर्पित कर मिसाल भी कायम की है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ निडर आवाज़
हरियाणा में कार्यकाल के दौरान चतुर्वेदी ने राजनीतिक दबाव और संरक्षण प्राप्त अधिकारियों की परवाह किए बिना वन विभाग की वित्तीय अनियमितताओं, भूमि अतिक्रमण और वन कानून उल्लंघन को उजागर किया। बाद में AIIMS, नई दिल्ली में उप सचिव और मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) रहते हुए उन्होंने 200 से अधिक भ्रष्टाचार मामलों का खुलासा किया। उनके साहसिक कदमों से कई बड़े घोटाले सामने आए, लेकिन उन्हें बार-बार ट्रांसफर, निलंबन और चार्जशीट का सामना भी करना पड़ा। इसके बावजूद, 2015 में उन्हें उनके असाधारण योगदान के लिए रैमॉन मैग्सेसे पुरस्कार (एशिया का नोबेल) मिला।

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AIIMS के लगभग 250 कर्मचारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर चतुर्वेदी की पुनर्नियुक्ति की मांग की। उनका आरोप था कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने गलत रिपोर्ट के आधार पर चतुर्वेदी को हटाया ।

समाज सेवा में योगदान
चतुर्वेदी ने अपने पुरस्कार और प्राप्त धनराशि को समाज सेवा में दान किया:
•रैमॉन मैग्सेसे पुरस्कार (2015): ₹19.85 लाख की राशि AIIMS को कैंसर पीड़ित मरीजों की सहायता के लिए दे दीए.
•मआवज़ा राशि (2019): उत्पीड़न मामले में क्षतिपूर्ति के तौर पर मिली ₹25,000 की राशी प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में जमा कर दी।
•पुलवामा शहीदों के लिए योगदान: ₹2.70 लाख की राशी ‘भारत के वीर’ फंड में समर्पित कर दीए ।

इंटेलिजेंस ब्यूरो की सराहना
IB ने चतुर्वेदी को “मेधावी अधिकारी” बताया और कहा कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में देश और समाज के लिए जिम्मेदार कार्य किया।

राष्ट्रपति के रिकॉर्ड आदेश
उनके पक्ष में भारत के राष्ट्रपति ने चार बार हस्तक्षेप कर हरियाणा सरकार के अवैध आदेशों को निरस्त किया –
• 2008: अवैध निलंबन रद्द।
• 2011: झूठी चार्जशीट निरस्त (स्पष्ट लिखा कि उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश लागू किए थे)।
• 2013: एक और चार्जशीट खारिज।
• 2014: ज़ीरो ए.सी.आर रिपोर्ट निरस्त कर “आउटस्टैंडिंग” घोषित।
इतने राष्ट्रपति हस्तक्षेप किसी भी अधिकारी के मामले में स्वतंत्र भारत में पहली बार दर्ज हुए।

पर्यावरण संरक्षण में मील का पत्थर
चतुर्वेदी ने पर्यावरणीय संरक्षण को नई ऊँचाइयाँ दीं। उनके नेतृत्व में कई ऐतिहासिक पहल शुरू हुईं, जैसे —
• विश्व का पहला लाइकेन गार्डन,
• भारत का पहला मॉस गार्डन,
• पहला क्रिप्टोगैमिक गार्डन,
• पहला फॉरेस्ट हीलिंग सेंटर,
• सबसे ऊँचाई पर स्थित हर्बल गार्डन,
• पहला पॉलिनेटर पार्क,
• पहली घास संरक्षण स्थली,
• देश का सबसे बड़ा एरोमैटिक गार्डन,
• पहली भारत वाटिका और
• अनोखे एथ्नोबॉटनिकल गार्डन।
इन कार्यों की सार्वजनिक सराहना उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने भी की।

अतिथि प्राध्यापक के रूप में सम्मान
केंद्रीय सरकार के साथ मुकदमेबाजी के बावजूद, देश की प्रतिष्ठित संस्थाएँ — पुलिस अकादमी हैदराबाद, आई.ए.एस अकादमी मसूरी, फॉरेस्ट अकादमी देहरादून, आई.आई.टी संस्थान और यहाँ तक कि अंतरिक्ष विभाग — उन्हें शासन और सिविल सेवकों के संवैधानिक संरक्षण जैसे विषयों पर Guest Faculty के रूप में आमंत्रित करती रही हैं।
सत्ता संस्थानों के आरोप
सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने सर्वोच्च न्यायालय में और अप्रैल 2024 में सीबीआई ने दिल्ली उच्च न्यायालय में हलफ़नामों के ज़रिए उन पर “आर्म ट्विस्टिंग” (दबाव बनाने) के आरोप लगाए। यह दर्शाता है कि सत्ता प्रतिष्ठान ईमानदार अधिकारियों को किस प्रकार निशाना बना सकते हैं।

न्यायपालिका में अद्वितीय रिकॉर्ड
संजीव चतुर्वेदी से जुड़े मामलों में 14 न्यायाधीशों ने स्वयं को अलग (Recusal) किया —
• सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई (2013) और यू.यू. ललित (2016) — दोनों बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने।
• उत्तराखंड हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल (2023) और मनोज तिवारी (2024)।
• शिमला ज़िला अदालत के ACJM — मुख्य सचिव विनीत चौधरी द्वारा दायर मानहानि मामले से।
• CAT के चेयरमैन न्यायमूर्ति एल. नरसिम्हन रेड्डी और छह अन्य (2019–2024)।
• नैनीताल ट्रायल कोर्ट (जून 2025) के न्यायाधीश।
सुप्रीम कोर्ट से लेकर जिला अदालत तक इतने बड़े पैमाने पर न्यायाधीशों का किसी एक अधिकारी के मामलों से अलग होना स्वतंत्र भारत में रिकॉर्ड है।

वर्तमान जांचें और चर्चित मामले
1.मसूरी वन प्रभाग में सीमा स्तंभ गायब

मसूरी और रायपुर रेंज में जंगल की सीमा दर्शाने वाले 7,375 सीमा स्तंभ गायब पाए गए। लगभग 80% स्तंभ लापता हैं। चतुर्वेदी ने इसे अधिकारियों की मिलीभगत और राजनीतिक संरक्षण से जुड़ी “सुनियोजित साजिश” बताया।
2.मुनस्यारी ईको-टूरिज्म परियोजना में 1.63 करोड़ का घोटाला

पिथौरागढ़ में ईको-टूरिज्म परियोजना में डॉ. विनय कुमार भार्गव पर बिना अनुमति निर्माण, बिना टेंडर सामग्री खरीद, निजी संस्थाओं को लाभ पहुँचाने, आय का बड़ा हिस्सा ट्रांसफर करने और फर्जी खर्च दिखाने जैसे आरोप हैं। चतुर्वेदी ने 700 पृष्ठों की रिपोर्ट तैयार कर CBI और ED से जांच की सिफारिश की। इसे “कॉर्बेट-2” भी कहा जाने लगा है।

सिस्टम में खड़े रहना भी चुनौतीपूर्ण है
एक अधिकारी जिसने अपने पुरस्कार और लाखों की राशि समाज सेवा में दान कर दी, उस पर उन के विरोध्यो द्वारा अपने ही दफ्तर के चाय-पानी के बिलों में गड़बड़ी का हवाला देकर भ्रष्टाचार का आरोप तक लगाने की नाकाम कोसिस की गई । विशेषज्ञ और आम लोग इसे भ्रष्टाचार विरोधी अधिकारियों के प्रति अनुचित व्यवहार और प्रशासन में राजनीतिक दबाव का उदाहरण मान रहे हैं। यह मामला यह दर्शाता है कि ईमानदार अधिकारियों के लिए सिस्टम में खड़े रहना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

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