देहरादून : सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को समय पर अस्पताल पहुंचाना अक्सर जीवन और मौत के बीच का फैसला साबित होता है। इसी ‘गोल्डन आवर’ को बचाने के लिए उत्तराखंड परिवहन विभाग आम नागरिकों को ‘राह-वीर’ (गुड सेमेरिटन) बनने के लिए प्रेरित कर रहा है। लेकिन बुधवार सुबह प्रेमनगर के ठाकुरपुर में हुई एक घटना ने विभाग के दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई उजागर कर दी। हादसे में घायल सड़क पर तड़पते रहे, जबकि कुछ कदम दूर खड़ी परिवहन विभाग की इंटरसेप्टर के कर्मचारी मदद करने के बजाय चुपदर्शक बने रहे।
ठाकुरपुर में दो बाइकों की भिड़ंत, तीन घायल
बुधवार सुबह करीब 10 बजे ठाकुरपुर क्षेत्र में दो बाइक आपस में टकरा गईं। इस जोरदार टक्कर में एक बाइक सवार जयदीप गंभीर रूप से घायल हो गए। दूसरी बाइक पर सवार दो युवक, जो एक निजी कॉलेज के छात्र बताए जाते हैं, भी घायल हुए। दोनों वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। हादसे की गंभीरता इतनी थी कि घायल तुरंत चिकित्सा सहायता के हकदार थे।
परिवहन विभाग के कर्मचारी मौके पर मौजूद, फिर भी मदद नहीं
हादसे के तुरंत बाद मौके पर पहुंचे परिवहन विभाग के कर्मचारियों ने स्थिति का जायजा लिया। आरोप है कि उन्होंने घायलों को अस्पताल पहुंचाने की कोई पहल नहीं की। इसके बजाय दोनों पक्षों को आपस में सुलह कर मामला निपटाने की सलाह दी गई। नतीजा यह रहा कि घायल करीब 45 मिनट तक सड़क पर पड़े रहे। बाद में स्वजन पहुंचे और उन्हें प्रेमनगर अस्पताल ले गए।
इस घटना की शिकायत आरटीओ प्रवर्तन डॉ. अनीता चमोला से की गई। उन्होंने प्रकरण की जांच शुरू कर दी है। विभाग के अपने कर्मचारियों के खिलाफ यह आरोप व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
राह-वीर योजना और गोल्डन आवर का विरोधाभास
उत्तराखंड परिवहन विभाग की राह-वीर योजना का मूल उद्देश्य ही सड़क दुर्घटना के पीड़ित को तत्काल सहायता प्रदान करना है। योजना के तहत मोटर वाहन दुर्घटना में घायल की मदद कर उसे गोल्डन आवर में अस्पताल या ट्रामा केयर सेंटर पहुंचाने वाले व्यक्ति को 25 हजार रुपये का नकद पुरस्कार दिया जाता है। आवेदन जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता वाली समिति के माध्यम से होता है।
विभाग आम लोगों को हादसा देखकर रुकने, घायल की मदद करने और उसकी जान बचाने के लिए अभियान चला रहा है। लेकिन ठाकुरपुर की घटना में सवाल यह उठता है कि जब विभाग के अपने कर्मचारी हादसे के इतने करीब मौजूद थे, इंटरसेप्टर मौके पर खड़ी थी और घायल सामने पड़े थे, तब मानवता और विभागीय जिम्मेदारी का यह पाठ उनके लिए लागू क्यों नहीं हुआ।
विभागीय लापरवाही पर उठते सवाल
यह मामला सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं है। यह दर्शाता है कि नीति और व्यवहार के बीच कितना अंतर हो सकता है। जब विभाग खुद नागरिकों को ‘राह-वीर’ बनने का पाठ पढ़ा रहा हो, तो उसके कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे सबसे पहले उदाहरण पेश करें। घायलों को लगभग पौन घंटे तक बिना सहायता के छोड़ देना गोल्डन आवर की अवधारणा के ठीक विपरीत है।






