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अल्पसंख्यक वर्ग की आड़ में सिकती राजनीतिक रोटियां।

अल्पसंख्यक वर्ग की आड़ में सिकती राजनीतिक रोटियां।
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Vijay rawat

कल्पना कीजिये आप ऐसे शहर में रह रहे हो जंहा की 97 प्रतिशत आबादी अल्पसंख्यक कहलाई जाती हो और 2 प्रतिशत आबादी को आप बहुसंख्यक मानेंगे तो हो सकता है आपकी कल्पना आपको भारतेंदु हरीश चंद की प्रिसिद्ध नाटक अन्धेर नगरी चोपट राजा में ले जाये । किन्तु इस कल्पना का वास्त्विकता अहसास करने के लिए आपको सिर्फ हिंदुस्तान में पैदा होना होगा।
यह बात आपको कुछ हास्यपद और कुछ गंभीरता में डाल सकती है।
हास्यात्मक इस लिए की एक मूर्ख को भी ऐसी तर्कपूर्ण बात आसानी से समझ आ जायेगी ऐसी योजनाओ के पीछे छुपे उद्देश्य भी साफ नजर आते है,और गंभीर इस लिए की ऐसी योजनाए हिंदुस्तान में लागू है। जो आपको ऐसे भारत से भी रूबरू कराती है।
आइये अब इसको समझते है,
भारत के संविधान में एक बार भाषाई एवं अल्पसंख्यक का उपयोग हुआ है। अनुच्छेद 30 में कहा गया है की भाषाएं एवं धार्मिक अल्पसंख्यक को अपना शिक्षण संस्थान खोलने की अनुमति है, मगर संविधान ने कभी अल्पसंख्यक को परिभाषित नहीं किया और ना ही किसी अतिरिक्त विशेष सुविधाओं को देने की बात कही गई,
क्योंकि अनुच्छेद 14 समता और समानता की बात करता है ,अनुच्छेद 15 धर्म जाति भाषा और स्थान पर भेदभाव को मना करता है। अनुच्छेद 16 सभी नागरिकों को समान अवसर उपलब्ध कराता है। अनुच्छेद 21 देश के सभी नागरिकों को समान सहित जीने का अधिकार देता है ।
। अनुच्छेद 29 में स्पष्ट किया गया है कि ऐसा समुदाय जिसकी भाषा संस्कृति या रीति रिवाज राज्य के अन्य समुदाय से बिल्कुल भिन्न हो उसे संरक्षित करने का पूर्ण अधिकार है, ये अनुच्छेद में आपको इस लिए बता रहा हु क्योंकि संविधान निर्माता खुद ये मानते थे कि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की अवधारणा ठीक नहीं। भारतीय संविधान हमेशा धर्म निरपेक्षता की बात हुई है। अल्पसंख्यक की बात करने से आपसी भेदभाव उत्पन होगा, किसी एक समुदाय को विशेष छूट देने से आपसी समानता और भाईचारे पर हमला होगा, इसलिए संविधान में किसी विशेष समुदाय को किसी भी प्रकार की रियायत का प्रावधान नहीं दिया गया , और ना ही अल्पसंख्यक को कभी परिभाषित किया गया।
1992 तक सब सही चल रहा था मगर चुनाव से कुछ दिन पहले तत्कालीन कांग्रेस सरकार को अल्पसंख्यक आयोग बनाने का विचार आया। यह विचार उन दबे-कुचले अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए जो सरकार की योजनाओं का लाभ से कोसों दूर थे। सरकार ने कानून तो बना दिया पर इस पर ना कोई विस्तृत चर्चा की और ना ही अल्पसंख्यक की परिभाषा दी गई। आखिर वो कौन से लोग होंगे उन्की क्या पहचान होगी, और किस आधार पे होगी।
आखिर 22-10-1993 को बिना किसी शोध जनगणना, विस्तृत चर्चा और विशेषज्ञों की सलाह के बिना 5 समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया गया।
लोक लुभावनी इस योजना में मुस्लिम,सिख,ईसाई ,बोद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया गया।
इस योजना में जैन समुदाय को भी आकर्षित किया और पूरा जैन समुदाय में अल्पसंख्यक होने की मांग उठने लगी, लेकिन मुंबई हाई कोर्ट ने जैन समुदाय की इस याचिका को खारिज कर दिया।
अब यंहा आपसी असमानता की नीव डल चुकी थी। हाई-कोर्ट से हारने के बाद जैन समुदाय के लोगों को 2005 सुप्रीम कोर्ट से भी निराशा हाथ लगी।
इससे धीरे-धीरे आपसी अंतराल लोगों में साफ दिखने लगा, जैन समुदाय इसे अपने अधिकारों पर हमला समझने लगे।
सविधान निर्माताओ के इस देश के सपने को यह करारा झटका था। आज वर्तमान स्तिथि में अब अल्पसंख्यक की परिभाषा यह है कि लक्ष्यदीप में 97 प्रतिशत, कश्मीर में 70 प्रतिशत, असम में 35 प्रतिशत, बंगाल और केरल में 28 प्रतिशत मुस्लिम अल्पसंख्यक हो गए। जिन्हें अब अल्पसंख्यक के रूप में विशेष सुविधाएं मिल रही है, उसी प्रकार नागालैंड में 88 प्रतिशत, मिजोरम में 87 प्रतिशत, मेघालय में 75 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में 31 प्रतिशत ईसाई अल्पसंख्यक वर्ग में है।
ऐसी योजना राजनीति बंदरबांट में अब एक बहुसंख्यक वर्ग और एक अल्पसंख्यक वर्ग का हो चला है जिससे दोनों के बीच की खाई धीरे धीरे बड रही है।
क्योंकि योजना का दूसरा पहलू यह भी है की लक्ष्यदीप में 2 प्रतिशत, मिजोरम में 3 प्रतिशत, नागालैंड के 8 प्रतिशत, मेघालय के 11 प्रतिशत और कश्मीर में 28 हिंदू बहुसंख्यक हैं । आखिर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में मशगूल सरकार यह भूल जाती है कि संविधान के अनुच्छेद 14 में समता और समानता की परिभाषित किया गया है ,मगर राजनीतिक लोभन के चलते अनुच्छेद 30 की आड़ में अल्पसंख्यक वर्ग के लिए दुनिया भर की योजनाएं बनाई और जनता द्वारा दिए गए कर से हजारों करोड़ों हर साल खर्च किए गए।
आज इस स्थिति के चलते सामाजिक भेदभाव, सामाजिक असमानता धीरे-धीरे हावी होती जा रही हैं,इस प्रकार सरकार की बिना विचार विमर्श की दिवालीय योजनाओं को लोकतंत्र के ऊपर हमला नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे।

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