दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना में अपना दाहिना पैर गंवाने वाले उत्तराखंड के एक लकड़हारे को बड़ी राहत देते हुए उसके मुआवजे की राशि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित 11.51 लाख रुपये के मुआवजे को बढ़ाकर 35.95 लाख रुपये कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दुर्घटना पीड़ितों की विकलांगता का आकलन केवल मेडिकल प्रमाणपत्रों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। अदालतों को यह भी देखना चाहिए कि चोट या विकलांगता का व्यक्ति की आजीविका और पेशे पर कितना प्रभाव पड़ा है। न्यायालय ने इस सिद्धांत को “कार्यात्मक विकलांगता” (Functional Disability) के रूप में मान्यता दी।
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि संबंधित व्यक्ति एक लकड़हारे के रूप में कार्य करता था और उसका दाहिना पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। ऐसे में वह अपने पेशे को पहले की तरह जारी रखने में असमर्थ हो गया। इसलिए उसकी विकलांगता का आकलन उसके पेशे के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2004 का है। जानकारी के अनुसार एक जीप ने लकड़हारे की मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी थी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। इलाज के दौरान चोट इतनी गंभीर पाई गई कि उसका दाहिना पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा।
दुर्घटना के बाद पीड़ित ने मुआवजे की मांग की थी। मामले की सुनवाई के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उसे 11.51 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। हालांकि पीड़ित ने इस राशि को अपर्याप्त बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की चोट उसके रोजगार और कमाई की क्षमता को लगभग समाप्त कर देती है, तो केवल शारीरिक विकलांगता का प्रतिशत देखकर मुआवजा तय नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में “कार्यात्मक विकलांगता” को आधार बनाना आवश्यक है।
अदालत ने माना कि लकड़हारे के लिए पैर खो देना उसकी आजीविका पर सीधा और गंभीर प्रभाव डालता है। इसी आधार पर अदालत ने उसे 100 प्रतिशत कार्यात्मक विकलांग मानते हुए मुआवजा बढ़ाकर 35.95 लाख रुपये कर दिया।









