उत्तराखंड : उत्तराखंड के विद्यालयी शिक्षा विभाग के अंतर्गत संचालित समग्र शिक्षा अभियान में ‘जादू का पिटारा’ उपकरण खरीद को लेकर गंभीर वित्तीय अनियमितताएं सामने आई हैं। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि राज्य के 11,580 प्राथमिक विद्यालयों के लिए 9,977 रुपये प्रति पिटारा की दर से कुल 11 करोड़ 55 लाख 33 हजार 660 रुपये खर्च किए गए। इस खरीद प्रक्रिया में विभागीय अधिकारियों और फर्मों के बीच कथित मिलीभगत का मामला उजागर हुआ है।
शिक्षा मंत्री ने इस गड़बड़ी का कड़ा संज्ञान लेते हुए तत्काल जांच के आदेश जारी किए हैं। उन्होंने निर्देश दिया है कि निदेशालय स्तर पर एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित कर पूरे मामले की विस्तृत जांच की जाए। अनियमितता पाए जाने पर दोषी अधिकारियों और संबंधित फर्मों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
90 लाख से अधिक की अनियमितता, निविदा प्रक्रिया प्रभावित
प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के अनुसार, 90 लाख रुपये से अधिक की राशि में वित्तीय गड़बड़ियां पाई गई हैं। विभाग ने निविदाएं आमंत्रित की थीं, लेकिन स्वीकृत बजट के बराबर राशि वाली निविदाओं को ही मंजूरी दी गई। इससे प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया पूरी तरह प्रभावित हुई और पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं।
प्रारंभिक शिक्षा निदेशक केएस रावत ने बताया कि शिक्षा मंत्री ने मामले की पूरी रिपोर्ट तलब की है और जिम्मेदार अधिकारियों तथा फर्मों की भूमिका स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं।
‘जादू का पिटारा’ क्या है और इसका उद्देश्य
‘जादू का पिटारा’ राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (NEP 2020) और NCERT की महत्वाकांक्षी पहल है। इसका मुख्य उद्देश्य 3 से 8 वर्ष तक के बच्चों (बालवाटिका से कक्षा 2) को खेल-आधारित, गतिविधि-उन्मुख और आनंददायक तरीके से शिक्षा प्रदान करना है। यह बच्चों में सीखने की प्रक्रिया को रोचक बनाता है और उनकी रचनात्मकता, संज्ञानात्मक विकास तथा भाषा कौशल को बढ़ावा देता है।
पिटारे में शामिल सामग्री:
चित्र एवं फ्लैश कार्ड
कहानी की पुस्तकें
पहेलियां एवं पजल
ब्लॉक एवं विभिन्न खिलौने
गणितीय सामग्री
अक्षर एवं संख्या कार्ड
स्थानीय भाषा व संस्कृति पर आधारित गतिविधियां
शिक्षकों के लिए गतिविधि पुस्तिका
प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय को इस पिटारे के लिए 9,977 रुपये आवंटित किए जाते हैं।
NEP 2020 के तहत महत्वपूर्ण पहल
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) पर विशेष जोर देती है। ‘जादू का पिटारा’ इसी दिशा में एक व्यावहारिक कदम है, जिसके जरिए बच्चों को औपचारिक स्कूली शिक्षा से पहले मजबूत नींव प्रदान की जाती है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में जहां संसाधन सीमित हैं, ऐसी योजनाओं का सही क्रियान्वयन बेहद जरूरी है।
आगे की कार्रवाई और अपेक्षाएं
शिक्षा विभाग अब इस मामले में पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी योजनाओं में किसी भी प्रकार की अनियमितता न केवल सरकारी धन की बर्बादी है बल्कि बच्चों के भविष्य से भी खिलवाड़ है।







