चमोली : उत्तराखंड के चारधाम यात्रा मार्ग पर चल रही ऑल वेदर रोड परियोजना के तहत बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-7) पर करोड़ों रुपये की लागत से कराए गए सुरक्षात्मक निर्माण कार्य इस वर्ष की पहली मानसून में ही विफलता के संकेत दे रहे हैं। गौचर और पीपलकोटी के आसपास स्थित संवेदनशील भूस्खलन क्षेत्रों में नवनिर्मित सुरक्षा दीवारों में क्षति दर्ज की गई है, जिससे निर्माण गुणवत्ता, डिज़ाइन और दीर्घकालिक स्थायित्व पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
कमेड़ा में सुरक्षा दीवार का 15 मीटर हिस्सा धंसा
गौचर के निकट कमेड़ा क्षेत्र लंबे समय से भूधंसाव की समस्या से ग्रस्त रहा है। यहां लगभग 120 मीटर लंबे प्रभावित हिस्से में एंकरिंग तकनीक और रिटेनिंग वॉल का निर्माण कार्य कराया जा रहा था। निर्माण प्रक्रिया अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि मानसून की शुरुआत के साथ ही भूधंसाव फिर से सक्रिय हो गया। परिणामस्वरूप नवनिर्मित सुरक्षा दीवार का करीब 15 मीटर हिस्सा धंस गया। स्थानीय प्रशासन और यात्रियों के अनुसार, यह घटना मार्ग की सुरक्षा और निरंतरता दोनों के लिए चिंता का विषय बन गई है।
कमेड़ा जैसे क्षेत्रों में भूवैज्ञानिक स्थितियां अत्यंत संवेदनशील हैं। यहां मिट्टी की संरचना, वर्षा जल का दबाव और ढलान की अस्थिरता पहले से ही चुनौतीपूर्ण रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त भू-तकनीकी अध्ययन और उचित जल निकासी व्यवस्था के अभाव में ऐसे निर्माण कार्य अस्थायी साबित हो सकते हैं।
बेलाकूची में सुरक्षा दीवार पर मोटी दरारें
पीपलकोटी के समीप बेलाकूची क्षेत्र में भी हाल ही में बनी हाईवे किनारे की सुरक्षा दीवार पर मोटी-मोटी दरारें उभर आई हैं। यह क्षेत्र भी भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील जोन में आता है। दीवार में आई दरारें निर्माण सामग्री की गुणवत्ता, नींव की मजबूती और डिज़ाइन मानकों पर सवाल खड़े कर रही हैं। फिलहाल कार्यदायी संस्था नेशनल हाईवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) प्रभावित हिस्सों में मिट्टी का भरान कर यातायात को सुचारु रखने का प्रयास कर रही है।
निर्माण गुणवत्ता और स्थायित्व पर उठे सवाल
ऑल वेदर रोड परियोजना का उद्देश्य चारधाम यात्रा मार्ग को साल भर सुगम और सुरक्षित बनाना है। इस परियोजना के अंतर्गत भूस्खलन प्रवण क्षेत्रों में सुरक्षा दीवारों, रिटेनिंग स्ट्रक्चर्स और एंकरिंग कार्यों पर भारी बजट खर्च किया जा रहा है। लेकिन पहली ही बरसात में इन कार्यों का आंशिक रूप से विफल होना निर्माण प्रक्रिया की निगरानी, सामग्री की गुणवत्ता जांच और साइट-स्पेसिफिक डिज़ाइन की कमी की ओर इशारा करता है।
एनएचआईडीसीएल के अधिकारियों ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए बताया कि भूधंसाव वाले स्थलों का विस्तृत तकनीकी परीक्षण कराया जाएगा। कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन कर स्थायी उपचार योजना तैयार की जाएगी, ताकि भविष्य में ऐसी समस्याएं दोबारा न हों। अधिकारियों का कहना है कि अस्थायी मरम्मत के साथ-साथ दीर्घकालिक समाधान पर भी काम तेज किया जा रहा है।








